इतिहास को समझना चाहिए, शिकायत के लिए नहीं: शशि रंजन कुमार
शशि रंजन कुमार ने कहा कि इतिहास को समझने की आवश्यकता है, इसे शिकायतों के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इस विषय पर डून लाइब्रेरी में चर्चा की गई।
इतिहास को समझना चाहिए, शिकायत के लिए नहीं: शशि रंजन कुमार
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देहरादून, 20 जून: डून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर में 'हिंदू सभ्यता का पतन: अतीत से सबक' नामक पुस्तक पर एक विस्तृत चर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा में लेखक शशि रंजन कुमार ने इतिहास को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि "अतीत का बदला नहीं लिया जा सकता, इसे केवल समझा जा सकता है।"
शशि रंजन कुमार आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के सचिव के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अतीत हमारी सामूहिक स्मृति में, खंडहरों में और हमारे समकालीन अस्तित्व को आकार देने के तरीकों में जीवित रहता है। उन्होंने कहा कि आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका अतीत की उपलब्धियों और विफलताओं का ईमानदारी से सामना करना है।
कुमार ने अपनी पुस्तक की चार प्रमुख श्रेणियों का वर्णन किया: "उज्ज्वलता, पतन, पराजय और कारण।" यह पुस्तक व्यापक शोध और तुलनात्मक ऐतिहासिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह कार्य विभिन्न क्षेत्रों में हिंदू सभ्यता के कमजोर होने का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें संस्कृति, राजनीति, समाज और बौद्धिक विचार शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि इतिहास को केवलnostalgia के स्रोत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह भी नहीं कि यह शिकायतों का भंडार है। उन्होंने दर्शकों के साथ बातचीत करते हुए कहा कि अतीत को समझना आवश्यक है ताकि भविष्य के लिए महत्वपूर्ण सबक निकाले जा सकें।
कुमार ने कहा कि पुस्तक में प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोतों का व्यापक उपयोग किया गया है, जैसे चचनामा, ताबकात-ए-नासिरी, किता ब अल-यामिनी, फुतुह अल-बुलदान, किता ब-उल-हिंद और अल-इस्तखरी की यात्रा रिपोर्ट।
प्राचीन भारत की बौद्धिक नींव पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू गणित की जड़ें ऋग्वेद में पाई जा सकती हैं, जहां एक विकसित दशमलव प्रणाली का उपयोग किया गया था। जीवन विज्ञान के संदर्भ में, उन्होंने भारतीय, ग्रीक और चीनी चिकित्सा परंपराओं की तुलना की।
कुमार ने कहा कि भारतीय चिकित्सा में प्लास्टिक सर्जरी जैसी तकनीकें अद्वितीय रूप से विकसित हुईं। पुस्तक में हिंदू सौंदर्यशास्त्र और संगीत परंपराओं की भी चर्चा की गई है, जो भारतीय ज्ञान प्रणालियों की गहराई और विविधता को उजागर करती है।
अंतिम अध्याय 'युद्ध धोखा है' में उन्होंने अफसोस व्यक्त किया कि कई स्थानीय शासक कौटिल्य की शिक्षाओं को भूल गए थे। उन्होंने कहा कि आधुनिक भारतीय शासकों के बीच युद्ध में व्यक्तिगत वीरता का महत्व अधिक हो गया था।
कुमार ने पुस्तक को एक गंभीर और साक्ष्य-आधारित वार्तालाप का प्रयास बताया, जो इतिहास, पहचान और बौद्धिक आत्म-नवीनीकरण पर केंद्रित है। इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को अतीत के साथ ईमानदारी से जुड़ने के लिए आमंत्रित करना है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व मुख्य सचिव एन रविशंकर ने की। मुख्य अतिथि मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने पुस्तक को वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज बताया।
इस चर्चा में इतिहासकार, साहित्य प्रेमी, पत्रकार, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और बड़ी संख्या में नागरिक शामिल हुए।
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टीम AVP Ganga
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