'शोले' पर भारी पड़ी थी ये फिल्म, देखने नंगे पांव थिएटर जाते थे दर्शक, स्क्रीन पर करते थे सिक्के-नोट की बारिश

1975 में धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन स्टारर ऐसी फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई, जिसने ऐसे रिकॉर्ड बनाए, जिन्हें अब तक कोई नहीं तोड़ पाया है। इस साल जो भी फिल्में रिलीज हुईं, शोले के आगे धूल चाटती दिखीं। लेकिन, इसी बीच रिलीज हुई एक फिल्म ने इस क्लासिक कल्ट को जबरदस्त टक्कर दी थी।

Apr 3, 2025 - 01:33
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'शोले' पर भारी पड़ी थी ये फिल्म, देखने नंगे पांव थिएटर जाते थे दर्शक, स्क्रीन पर करते थे सिक्के-नोट की बारिश
'शोले' पर भारी पड़ी थी ये फिल्म, देखने नंगे पांव थिएटर जाते थे दर्शक, स्क्रीन पर करते थे सिक्के-नोट क

‘शोले’ पर भारी पड़ी थी ये फिल्म, देखने नंगे पांव थिएटर जाते थे दर्शक, स्क्रीन पर करते थे सिक्के-नोट की बारिश

AVP Ganga

लेखक: प्रिया शर्मा, टीम नेटानागरी

परिचय

भारतीय फिल्म उद्योग में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो न केवल आर्थिक सफलता का खिताब जीतती हैं बल्कि दर्शकों के दिलों में असीम स्थान भी बनाती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है 'शोले', लेकिन क्या आपने सुना है कि एक और फिल्म ने 'शोले' के मुकाबले भीड़ को अपने प्रति आकर्षित किया? यह एक ऐसी फिल्म थी, जिसने दर्शकों को नंगे पांव थिएटर जाने पर मजबूर कर दिया और जब दर्शक स्क्रीन पर सिक्के और नोटों की बारिश करते थे, तब उस फिल्म की लोकप्रियता का पता चलता था।

फिल्म का नाम और कहानी

यह फिल्म थी ‘मुगल-ए-आज़म’। 1960 में रिलीज़ हुई इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में एक नया मानदंड स्थापित किया। इस फिल्म की कहानी प्रेम, बलिदान, और संघर्ष पर आधारित है जो सम्राट अकबर और उनके बेटे सलीम के बीच के रिश्ते को दर्शाती है। अदाकारी और संगीत के साथ-साथ फिल्म के अतुलनीय दृश्यांकन ने इसे क्लासिक बना दिया।

दर्शकों का उत्साह

मुगल-ए-आज़म को देखने के लिए दर्शक चौक-चौराहों पर नंगे पांव थिअटर जा रहे थे। पहले दिन के शो में, थिएटर के बाहर लंबी लाइनें लगी रहती थीं। दर्शक अपनी खुशी को खत्म नहीं कर पाने के लिए पैसे उड़ा रहे थे। इस फिल्म की सफलता का यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, जब फिल्म के शो में दर्शक सिक्के और नोट गिराते थे, जो इस बात का संकेत था कि वे शो का कितना आनंद ले रहे हैं।

संस्कृति पर प्रभाव

इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में एक नया अध्याय जोड़ा और इसका प्रभाव भारतीय फिल्म निर्माण पर आज भी देखा जा सकता है। इसे देखते हुए कई निर्माता और निर्देशक इसकी तर्ज पर फिल्में बनाने का प्रयास करते हैं। 'मुगल-ए-आज़म' की संगीत, संवाद और कहानी ने भारतीय सिनेमा की रोटी में एक खास मोड़ दिया।

निष्कर्ष

इस प्रकार, 'मुगल-ए-आज़म' एक ऐसी फिल्म है जिसने न केवल अपने समय में व्यापार किया बल्कि आज भी हमारे दिलों में जीवित है। जबकि 'शोले' ने भी अपनी अद्वितीयता और लोकप्रियता के चलते एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है, लेकिन 'मुगल-ए-आज़म' का जादू भी फिल्म प्रेमियों में अद्वितीय बना रहता है। दर्शकों के अनुभव और फिल्म में दिखाए गए समर्पण ने इसे समय के पार एक अमर फिल्म बना दिया है।

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